जिन रामभक्त कारसेवकों पर मुलायम ने चलवाई गोलियाँ, CM योगी ने की उनका स्मारक बनाने की घोषणा

08 जनवरी, 2022 By: DoPolitics स्टाफ़
विवादित ढाँचे पर भगवा लहराने वाले बलिदानी कोठारी बंधू

अयोध्या में श्रीराम मंदिर के साथ राम मंदिर आंदोलन में बलिदान देने वाले कारसेवकों का स्मारक बनेगा। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने शनिवार (8 जनवरी, 2022) के दिन ये ऐलान किया है। बता दें कि 2 नवंबर, 1990 को राममंदिर आंदोलन के दौरान हुए को लेकर गोलीकांड में कई कारसेवक मारे गए थे।

अयोध्या में भव्य राममंदिर निर्माण के साथ रामजन्मभूमि आंदोलन मेंबलिदान देने वाले कारसेवकों की याद में स्मारक भी बनाया जाएगा। साथ ही, मंदिर परिसर में बलिदानियों की प्रतिमाएँ भी स्थापित की जाएँगी ताकि बलिदानी कारसेवकों से लोग प्रेरणा ले सकें।

सीएम योगी आदित्यनाथ ने कहा कि उन सभी कारसेवकों की याद में स्मारक बनाया जाएगा जिन्होंने राममंदिर के लिए प्राण न्योछावर किए। हाल ही मुख्यमंत्री ने कहा था कि मुख्यमंत्री होने से पहले भी मैं एक हिन्दू था और अब भी एक हिन्दू हूँ, और हिन्दू ही रहूँगा। उन्होंने कहा था, गर्व से कहो हम हिन्दू है।

ज्ञात हो कि 2 नवंबर, 1990 के दिन रामजन्मभूमि पर भगवा झंडा लहराने देश भर से बड़ी संख्या में कारसेवक पहुँचे थे। कारसेवकों ने विवादित ढाँचे पर भगवा ध्वज फहराने की कोशिश की। तब भीड़ को हटाने और उन्हें नियंत्रित करने की कोशिश की गई, लेकिन रामभक्तों की भीड़ लगातार बढ़ती ही गयी।

तब तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव के निर्देश पर पुलिस ने भीड़ पर गोली चलाई। जिसमें बड़ी संख्या में कारसेवक शहीद हुए थे। तब से हर साल 2 नवम्बर को कारसेवकों की याद में शहीदी दिवस भी मनाया जाता है।

कारसेवकों पर मुलायम सिंह ने चलवाई थी गोलियाँ

वर्ष 1990 आज अतीत की धुँधली याद जैसा लगता है। लेकिन इस वर्ष की एक बड़ी घटना वर्तमान भारतीय समाज और राजनीति को प्रभावित करती हैं। इसी वर्ष अयोध्या श्रीराम मंदिर में मौजूद विवादित ढाँचे पर रामभक्तों ने कूच किया था।

अयोध्या में श्रीराम मंदिर के लिए अभियान आरएसएस प्रतिनिधि सभा के 1986 के प्रस्ताव के बाद से चल रहा था, लेकिन तत्कालीन भाजपा अध्यक्ष लालकृष्ण आडवाणी द्वारा राष्ट्रव्यापी रथ यात्रा का नेतृत्व करने का फैसला करने के बाद इसे गति मिली।

यही वो समय था जब देश में मंडल आयोग को लेकर विवाद चरम पर था। मंडल आयोग की रिपोर्ट अगस्त माह में लागू हुई और उसी साल अक्टूबर माह में श्रीराम मंदिर अभियान में तेजी आई।

सत्तारूढ़ जनता दल में अंदरूनी कलह के कारण केंद्र में वीपी सिंह की सरकार अस्थिर थी। उत्तर प्रदेश में उसी पार्टी के मुलायम सिंह यादव मुख्यमंत्री थे। जनता दल उस समय आरएसएस, भाजपा और विहिप के ‘अयोध्या अभियान’ के घोर विरोध में था।

मुलायम सिंह यादव ने अक्टूबर, 1990 में लालकृष्ण आडवाणी की रथ यात्रा का विरोध करते हुए घोषणा की थी कि “उन्हें अयोध्या में घुसने की कोशिश करने दें। हम उन्हें कानून का मतलब सिखाएँगे। कोई मस्जिद नहीं तोड़ी जाएगी।”

लालकृष्ण आडवाणी अयोध्या में प्रवेश नहीं कर सके क्योंकि उन्हें बिहार में जनता दल की लालू प्रसाद सरकार ने गिरफ्तार कर लिया था। लेकिन अयोध्या अभियान के लिए उत्तर प्रदेश शहर में कारसेवकों (स्वयंसेवकों) की एक विशाल सभा उमड़ गई।

30 अक्टूबर को कारसेवकों और पुलिस के बीच झड़प हो गई। विहिप, आरएसएस और भाजपा, विवादित ढाँचे की जगह श्रीराम मंदिर चाहते थे, लेकिन यह अभी तक स्पष्ट नहीं था कि कारसेवक मस्जिद का क्या करेंगे।

30 अक्टूबर की दोपहर तक पुलिस को तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव से कारसेवकों पर गोली चलाने का आदेश मिला। फायरिंग से अफरा-तफरी और भगदड़ मच गई। पुलिस ने अयोध्या की गलियों में कारसेवकों को खदेड़ा।

2 नवंबर को संघर्ष का एक और दौर शुरू हुआ, जब कारसेवक वापस आए और एक अलग रणनीति अपनाते हुए बाबरी मस्जिद की ओर अपना मार्च फिर से शुरू किया। 2 नवंबर के दिन भव्य राम मंदिर के शिलान्यास की माँग को लेकर हजारों की संख्या में कारसेवक अयोध्या में इकट्ठा हुए थे।

एक समूह का नेतृत्व बजरंग दल के तत्कालीन नेता विनय कटियार कर रहे थे। इन कारसेवकों में कोठारी बंधु भी शामिल थे। इससे पहले कि ये कारसेवक श्रीराम जन्मभूमि परिसर की ओर बढ़ते, पुलिस ने उन्हें रोक लिया। कारसेवकों ने पुलिसिया कार्रवाई का विरोध किया, झड़पें भी हुईं। कारसेवक हनुमानगढ़ी के पास सड़क पर बैठकर भजन-कीर्तन करते हुए विरोध प्रदर्शन करने लगे।

उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव के आदेश पर उत्तर प्रदेश पुलिस ने कारसेवकों पर गोलियाँ चलानी शुरू कर दी। पुलिस की गोली लगने से कई कारसेवकों की मृत्यु हो गई।

पुलिस कार्रवाई के बाद भगदड़ मच गई। सरयू ब्रिज पर भगदड़ में कई लोगों की जान गई मगर कोठारी बंधुओं ने विवादित बाबरी मस्जिद के ढाँचे पर भगवा लहरा दिया। ये दोनों भी पुलिस की गोली के शिकार बने। कोठारी बंधुओं के सर और गले में गोलियाँ लगी थीं। सरकारी आँकड़े में 16 कारसेवकों की मौत होने की बात दर्ज है।

अगली सुबह, 3 नवंबर 1990 को हिंदी समाचार पत्र जनसत्ता में प्रकाशित रिपोर्ट में लिखा गया था,

“राजस्थान के श्रीगंगानगर का एक कारसेवक, जिसका नाम पता नहीं चल पाया है, गोली लगते ही गिर पड़ा और उसने अपने खून से सड़क पर लिखा ‘सीताराम’। पता नहीं यह उसका नाम था या भगवान का स्मरण। मगर सड़क पर गिरने के बाद भी सीआरपीएफ की टुकड़ी ने उसकी खोपड़ी पर 07 गोलियाँ मारीं।”

इसके बाद 6 दिसंबर, 1992 के दिन जब कारसेवकों द्वारा विवादित ढाँचा तोड़ा गया था, तब कल्याण सिंह उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री थे। अयोध्या के संतों का आज भी यह दृढ़ विश्वास है कि श्रीराम मंदिर का निर्माण संभव नहीं होता अगर कल्याण सिंह तब उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री नहीं होते।



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